Thursday, July 18, 2019

चुटकुला! सर पटक पटक कर हँसने वाला

               


        ह चुटकुला ठहाके                            लगाने को मजबूर कर देगा
















पवन का सर फट गया।
डॉक्टर:- ये कैसे हुआ?
पवन : मैं ईंट से पत्थर तोड़ रहा था।
एक आदमी ने मुझसे कहा, 'कभी खोपड़ी का इस्तेमाल भी कर लिया कर।' 
डॉक्टर: फिर ? 
पवन : फिर क्या, किया न खोपड़ी का इस्तेमाल तभी तो फूटा सर... हाँहाहाहाहाहाहा

Wednesday, July 17, 2019

विवेक के बिना ज्ञान का कोई महत्व नहीं

                 
          विवेक के बिना 
             ज्ञान का 
            कोई महत्व 
                नही

         एक दिन एक लंबा चौड़ा व्यक्ति सामान लेकर एक स्टेशन पर उतरा। वह स्टेशन से बाहर आया और अपने लिए टैक्सी तलाशने लगा। सामने ही एक टैक्सी वाला खड़ा था। 

उस व्यक्ति ने टैक्सी वाले से कहा लाल किला जाना है, कितना पैसा लोगे? 
टैक्सी वाला बोला - 100 रु. लगेंगे। 


उस व्यक्ति ने बुद्धिमानी दिखाते हुए कहा- इतने पास के 100 रु., यह क्या लूट मचा रखी है। मैं पैदल ही अपना सामान लेकर लाल किला तक पहुंच जाऊंगा। 

आदमी जिद्दी था और इसी कारण उसने अपना सामान उठाया और पैदल ही चलने लगा। आधे घंटे तक चलने के बाद उसे फिर से वही टैक्सी वाला दिखाई दिया। 



उसने टैक्सी वाले को रोका और कहा कि अब तो आधी दूरी तय हो गई है अब कितना पैसा लोगे? टैक्सी वाला बोला अब 200 रु. लगेंगे। आदमी हैरान रह गया और उसने पूछा कि पहले 100 लग रहे थे और अब 200 क्यों लगेंगे? 

टैक्सी वाले ने फट से जवाब दिया महाशय आप लाल किला से ठीक उल्टी दिशा में 3 किलोमीटर दूर आ गए हैं। लाल किला स्टेशन के दूसरी ओर है। उस व्यक्ति ने इसके बाद कुछ नहीं कहा और चुपचाप गाड़ी में बैठ गया। 

बात सच भी है सिर्फ ज्ञान होने से कुछ नहीं होता बल्कि ज्ञान के साथ विवेक भी जरूरी है। इसी तरह सिर्फ शक्ति होना पर्याप्त नहीं है बल्कि शक्ति का समझ के साथ इस्तेमाल जरूरी है। 

Friday, July 12, 2019

सफलता की मिसाल हरीश चंदर आईएएस


                                 हरीश चंदर आईएएस                                                                  का सफर



यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाड़ी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है।

👉मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें

मैंने संघर्ष की ऐसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पड़ता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढ़ाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाड़ी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।

👉मेरी हिम्मत: मां और बाबा

मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढ़ाने की हर संभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढ़ाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढ़ाई पर पड़ा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढ़ाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढ़ाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पड़ेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

👉मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेंद्र सर

यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढ़ने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विषय थे। विषय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड़ है। उनका पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।

मैंने जिंदगी के हर मोड़ पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थितियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और खुद भी पढ़ता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।

👉मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान

मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऐसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सब कुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।

👉मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो।

मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छा शक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, "मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.."

 आप

👉दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले दिहाड़ी मजदूर के बेटे हरीश चंदर ने पहले प्रयास में तय किया आईएएस का सफर।

यह कहानी है एक जिद की, यह दास्तां है एक जुनून की, यह कोशिश है सपने देखने और उन्हें पूरा करने की। यह मिसाल है उस जज्बे की, जिसमें झुग्गी बस्ती में रहते हुए एक दिहाड़ी मजदूर का बेटा आईएएस अफसर बन गया है। पिता एक दिहाड़ी मजदूर, मां दूसरों के घर-घर जाकर काम करने वाली बाई। कोई और होता तो शायद कभी का बिखर गया होता, लेकिन दिल्ली के 21 वर्षीय हरीश चंदर ने इन्हीं हालात में रहकर वह करिश्मा कर दिखाया, जो संघर्षशील युवाओं के लिए मिसाल बन गया। दिल्ली के ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप की झुग्गी नंबर 208 में रहने वाले हरीश ने पहले ही प्रयास में आईएएस परीक्षा में 309वीं रैंक हासिल की है।
👉संघर्ष की सफलता की कहानी, हरीश चंदर की जुबानी।

👉मेरा बचपन: चने खाकर गुजारी रातें

मैंने संघर्ष की ऐसी काली कोठरी में जन्म लिया, जहां हर चीज के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती थी। जब से मैंने होश संभाला खुद को किसी न किसी लाइन में ही पाया। कभी पीने के पानी की लाइन में तो कभी राशन की लाइन में। यहां तक कि शौच जाने के लिए भी लाइन में लगना पड़ता था। झुग्गी में माहौल ऎसा होता था कि पढ़ाई कि बात तो दूर सुबह-शाम का खाना मिल जाए, तो मुकद्दर की बात मानी जाती थी। बाबा (पापा) दिहाड़ी मजूदर थे। कभी कोई काम मिल जाए तो रोटी नसीब हो जाती थी, नहीं तो घर पर रखे चने खाकर सोने की हमें सभी को आदत थी। झुग्गी में जहां पीने को पानी मयस्सर नहीं होता वहां लाइट की सोचना भी बेमानी है। झोपड़ी की हालत ऐसी थी कि गर्मी में सूरज, बरसात में पानी और सर्दी में ठंड का सीधा सामना हुआ करता था।

👉मेरी हिम्मत: मां और बाबा

मेरे मां-बाबा पूरी तरह निरक्षर हैं, लेकिन उन्होंने मुझे और मेरे तीन भाई-बहनों को पढ़ाने की हर संभव कोशिश की। लेकिन जिस घर में दो जून का खाना जुटाने के लिए भी मशक्कत होती हो, वहां पढ़ाई कहां तक चल पाती। घर के हालात देख मैं एक किराने की दुकान पर काम करने लगा। लेकिन इसका असर मेरी पढ़ाई पर पड़ा। दसवीं में मैं फेल होते-होते बचा। उस दौरान एक बार तो मैंने हमेशा के लिए पढ़ाई छोड़ने की सोच ली। लेकिन मेरी मां, जिन्हें खुद अक्षरों का ज्ञान नहीं था, वो जानती थीं के ये अक्षर ही उसके बेटे का भाग्य बदल सकते हैं। मां ने मुझे पढ़ाने के लिए दुकान से हटाया और खुद दूसरों के घरों में झाडू-पोंछा करने लगी। उनके कमाए पैसों को पढ़ाई में खर्च करने में भी मुझे एक अजीब सा जोश आता था। मैं एक-एक मिनट को भी इस्तेमाल करता था। मेरा मानना है कि आपको अगर किसी काम में पूरी तरह सफल होना है तो आपको उसके लिए पूरी तरह समर्पित होना पड़ेगा। एक प्रतिशत लापरवाही आपकी पूरी जिंदगी के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है।

👉मेरे प्रेरक : मां, गोविंद और धर्मेंद्र सर

यूं तो मां मेरी सबसे बडी प्रेरणा रही है, लेकिन मैं जिस एक शख्स से सबसे ज्यादा प्रभावित हूं और जिसने मुझे झकझोर कर रख दिया, वह है गोविंद जायसवाल। वही गोविंद जिसके पिता रिक्शा चलाते थे और वह 2007 में आईएएस बना। एक अखबार में गोविंद का इंटरव्यू पढ़ने के बाद मुझे लगा कि अगर वह आईएएस बन सकता है तो मैं क्यूं नहीं मैं बारहवीं तक यह भी नहीं जानता था कि आईएएस होते क्या हैं लेकिन हिंदू कॉलेज से बीए करने के दौरान मित्रों के जरिए जब मुझे इस सेवा के बारे में पता चला, उसी दौरान मैंने आईएएस बनने का मानस बना लिया था। परीक्षा के दौरान राजनीतिक विज्ञान और दर्शन शास्त्र मेरे मुख्य विषय थे। विषय चयन के बाद दिल्ली स्थित पतंजली संस्थान के धर्मेंद्र सर ने मेरा मार्गदर्शन किया। उनकी दर्शन शास्त्र पर जबरदस्त पकड़ है। उनका पढ़ाने का तरीका ही कुछ ऐसा है कि सारे कॉन्सेप्ट खुद ब खुद क्लीयर होते चले जाते हैं। उनका मार्गदर्शन मुझे नहीं मिला होता तो शायद मैं यहां तक नहीं पहुंच पाता।

👉मेरा जुनून : हार की सोच भी दिमाग में न आए।

मैंने जिंदगी के हर मोड़ पर संघर्ष देखा है, लेकिन कभी परिस्थितियों से हार स्वीकार नहीं की। जब मां ने किराने की दुकान से हटा दिया, उसके बाद कई सालों तक मैंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया और खुद भी पढ़ता रहा। इस दौरान न जाने कितने लोगों की उपेक्षा झेली और कितनी ही मुसीबतों का सामना किया। लोग मुझे पास बिठाना भी पसंद नहीं करते थे, क्योंकि मैं झुग्गी से था। लोग यह मानते हैं कि झुग्गियों से केवल अपराधी ही निकलते हैं। मेरी कोशिश ने यह साबित कर दिया कि झुग्गी से अफसर भी निकलते हैं। लोगों ने भले ही मुझे कमजोर माना लेकिन मैं खुद को बेस्ट मानता था। मेरा मानना है कि जब भी खुद पर संदेह हो तो अपने से नीचे वालों को देख लो, हिम्मत खुद ब खुद आ जाएगी। सही बात यह भी है कि यह मेरा पहला ही नहीं आखिरी प्रयास था। अगर मैं इस प्रयास में असफल हो जाता तो मेरे मां-बाबा के पास इतना पैसा नहीं था कि वे मुझे दोबारा तैयारी करवाते।

👉मेरी खुशी : बाबूजी का सम्मान

मेरी जिंदगी में सबसे बड़ा खुशी का पल वह था, जब हर दिन की तरह बाबा मजदूरी करके घर लौटे और उन्हें पता चला कि उनका बेटा आईएएस परीक्षा में पास हो गया है। मुझे फख्र है कि मुझे ऐसे मां-बाप मिले, जिन्होंने हमें कामयाबी दिलाने के लिया अपना सब कुछ होम कर दिया। मुझे आज यह बताते हुए फख्र हो रहा है कि मेरा पता ओट्रम लेन, किंग्सवे कैंप, झुग्गी नंबर 208 है। उस दिन जब टीवी चैनल वाले, पत्रकार बाबा की बाइट ले रहे थे तो उनकी आंसू भरी मुस्कुराहट के सामने मानों मेरी सारी तकलीफें और मेहनत बहुत बौनी हो गई थीं।

👉मेरा संदेश : विल पावर को कमजोर मत होने दो।

मेरा मानना है कि एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में ज्ञान का फर्क नहीं होता, फर्क होता है तो सिर्फ इच्छा शक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो। बावजूद इसके आपकी विल पावर मजबूत हो, आप पर हर हाल में कामयाब होने की सनक सवार हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। वैसे भी जब हम कठिन कार्यों को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हैं और उन्हें खुशी और उत्साह से करते हैं तो चमत्कार होते हैं। यूं तो हताशा-निराशा कभी मुझपर हावी नहीं हुई, लेकिन फिर भी कभी परेशान होता था तो नीरज की वो पंक्तियां मुझे हौसला देती हैं, "मैं तूफानों में चलने का आदी हूं.."

 आप जैसो की कमी है| हमारे देश मे सर सलाम है आपको 

Thursday, July 11, 2019

परिश्रम


परिश्रम 

      उठो, दौड़ो, परिश्रम करो|गिरना तय है, गिरने से ना गिरने की समझ आएगी | तो डरना क्यों, परिश्रम करते रहिए| फल अवश्य मिलेगा|
    किशनपुरा गाँव मे एक लड़का रहता था| उसका नाम राज था|राज बहुत मेहनती था|हर चुनौती को वह हँसकर गले लगा लेता था|लेकिन उसकी चुनौतिया कभी कम ही नही हुई|
     एक दिन वह मार्केट गया, कुछ सामान लेने | सामान लेकर जैसे ही वह मार्केट से निकला उसका दायां पैर ने काम करना बंद कर दिया|वह जैसे चलने की कोशिश करता चल नही सकता था | जैसे मानो उसका पैर है ही नही |उसके मम्मी पापा ने राज को हॉस्पिटल में भर्ती कराया|जांच के दौरान पता चला कि, उसकी मेरुदंड में सूजन आ गई हैं| डॉक्टर ने राज से कहा "राज आपकी मेरुदंड में सूजन है इस बीमारी का कोई इलाज नही है लेकिन आपको कसरत करनी है| उससे सूजन कम होगी|"
    घर जाने के बाद राज हर दिन कसरत करता था|सुबह,शाम,दिन,रात उसने एक कर दिया|कुछ महीनों बाद एक दिन ऐसा भी आया जब उसका परिश्रम रंग लाया और उसकी मेरुदण्ड की सूजन चली गई| लेकिन वह फिर भी चल नही सकता |डॉक्टर ने जांच की, जांच में पत्ता चला कि  सूजन चली गई है, लेकिन नस को damage कर गई |नस को ठीक होने के लिये वापस के राज ने और exercise करनी शुरु कर दी|जिससे नस ठीक हो सके|एक दिन उसकी मेहनत अवश्य रंग लाएगी और उसकी नस repair होगी|

                                                (brahma maurya)